व्यंजन के कितने भेद होते हैं? | Vyanjan ke kitne bhed hote hain

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आज के इस लेख में हम हिंदी यानी हिंदी व्याकरण के एक महत्वपूर्ण भाग व्यंजन के बारे में जानेंगे कि व्यंजन क्या है? व्यंजन कितने प्रकार का होता है? (Vyanjan kitne prakar ke hote hain) यानी व्यंजन के कितने भेद होते हैं? (Vyanjan ke kitne bhed hote hain) इत्यादि।

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दोस्तों आज के समय में अंग्रेजी भाषा का चलन है, हर क्षेत्र में इसका उपयोग किया जा रहा है परंतु इससे हिंदी जो कि हमारी मातृभाषा है, इसका महत्व बिल्कुल भी कम नहीं होता है। आज के समय में कई प्रतियोगी परीक्षाओं में भी हिंदी शामिल रहता है।

यदि आप UPTET, CTET, HTET इत्यादि जैसी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं तो हिंदी और उसमें विशेष करके हिंदी व्याकरण की अच्छी नॉलेज होना जरूरी हो जाता है।

व्यंजन क्या है?

व्यंजन क्या है इसे समझने के लिए आसान होगा पहले यह जानना की वर्ण क्या है। वर्ण भाषा की वह छोटी इकाई होती है जिसे और तोड़ा नहीं जा सकता, आसान शब्दों में अक्षर को ही वर्ण कहा जाता है। इसीलिए हिंदी भाषा में हम जो अक्षर पढ़ते हैं उन्हें ही वर्ण कहा जाता है। अब वर्ण तीन प्रकार के होते हैं जिनमें स्वर वर्ण व्यंजन वर्ण तथा अयोगवाह वर्ण आते हैं जिनमें से हमें यहां व्यंजन वर्ण के बारे में जानना है।

उन वर्णो को व्यंजन वर्ण कहा जाता है जिनका उच्चारण स्वर वर्णों की सहायता के बिना नहीं किया जा सकता। यानी स्वर वर्ण की सहायता से बोले जाने वाले वर्ण व्यंजन वर्ण कहलाते हैं। क ख ग घ इस तरह के वर्ण है जिनका उच्चारण हम स्वर वर्ण के बिना नहीं कर सकते हैं, इसीलिए यह सारे वर्ण व्यंजन वर्ण के अंतर्गत आते हैं।

व्यंजन वर्णों के उदाहरण में क ख ग घ ट थ द ड च छ ज झ सहित इस तरह के अन्य, व्यंजन वर्णों की सूची में आते हैं। हिंदी भाषा की हिंदी वर्णमाला में व्यंजनों की संख्या 33 है। इन 33 व्यंजन वर्णों का उपयोग हिंदी भाषा में किया जाता है।

व्यंजन के कितने भेद होते हैं? (Vyanjan ke kitne bhed hote hain)

व्यंजन के कितने भेद होते हैं (Vyanjan ke kitne bhed hote hain) यानी व्यंजन कितने प्रकार के होते है? (Vyanjan ke prakar) , इसका सही उत्तर यह पूछने पर दिया जा सकता है कि किस आधार पर।

व्यंजनों का वर्गीकरण अलग-अलग आधार पर किया गया है। व्यंजनों के वर्गीकरण के कुल 6 आधार हैं।

मूल विभाजन के आधार पर व्यंजन के कितने भेद होते हैं?

मूल विभाजन के आधार पर व्यंजनों को चार भागों में बांटा गया है। यही विभाजन सबसे पहला और सबसे प्राचीन विभाजन है।

इस आधार पर मूलत: चार प्रकार के व्यंजन होते हैं- 

  • स्पर्श व्यंजन
  • अन्त:स्थ व्यंजन
  • ऊष्म व्यंजन
  • संयुक्त व्यंजन

आइए अब मूल विभाजन के आधार पर विभाजित व्यंजन के इन भेदों को एक एक करके उदाहरण सहित जानते हैं।

1. स्पर्श व्यंजन – उन व्यंजन को स्पर्श व्यंजन कहते हैं जिनका उच्चारण करने पर जीभ मूल्य उच्चारण स्थानों जिनमें कंठ तालु दंत ओष्ठ मुर्दा मुर्दा आते हैं, को स्पर्श करती है। इसी के कारण इनका नाम स्पर्श व्यंजन पड़ा है।

इन व्यंजनों में शुरू के 5 वर्ग आने के कारण ये वर्गीय व्यंजन भी कहलाते हैं। हमारी जीभ जब अलग-अलग उच्चारण स्थानों से टकराती है तब यह व्यंजन उत्पन्न होते हैं इसीलिए इन्हें उदित व्यंजन भी कहा जाता है।

स्पर्श व्यंजनों की संख्या 25 है। इसमें शुरू के 5 वर्ग आते हैं जिसमें 

  • क वर्ग में क ख ग घ ङ, 
  • च वर्ग में च,छ, ज,झ,ञ  
  • ट वर्ग में ट,ठ, ड, ढ, ण   
  • त वर्ग में त,थ,द, ध, न
  • प वर्ग में प,फ, ब,भ,म 

आते हैं। यह सारे स्पर्श व्यंजन कहलाते हैं क्योंकि इनका उच्चारण करते समय जीभ मुंह के भिन्न उच्चारण स्थानों से टकराती है। हिंदी भाषा में इन वर्णो का उपयोग किया जाता है।

2. अन्त:स्थ व्यंजन – उन व्यंजनों को अन्त:स्थ व्यंजन कहा जाता है जिन का उच्चारण करते समय हमारी जीभ हमारे मुंह के किसी भी भाग को पूरी तरह नहीं छूती है,  यानी इन व्यंजनों का उच्चारण मुंह के भीतर से ही होता है।

अंत: का अर्थ ही होता है – भीतर या अंदर, इसीलिए जिन का उच्चारण मुंह के भीतर से होता है वे अन्त:स्थ व्यंजन कहलाते हैं।

अन्त:स्थ व्यंजनों की संख्या चार है। व्यंजन वर्णों में से  य,र,ल,व अन्त:स्थ व्यंजन कहलाते हैं क्योंकि इन व्यंजनों का उच्चारण मुंह के भीतर से ही किया जाता है, इनका उच्चारण करते समय जीभ मुंह के किसी भी भाग को पूरी तरह स्पर्श नहीं करती है।

3. ऊष्म व्यंजन – उन व्यंजनों को ऊष्मा व्यंजन कहा जाता है जिनका उच्चारण करते समय उस्मा यानी गर्मी उत्पन्न होती है । इनका उच्चारण करते समय मुंह से गर्म हवा निकलती है या मुंह से निकलने वाली हवा के रगड़ खाने के कारण उस्मा पैदा करती है। उस्मा का मतलब ही होता है गर्मी या गर्माहट।

उष्म व्यंजनों की संख्या भी चार है। व्यंजन वर्णों में से श,ष,स,ह उष्म व्यंजन कहलाते हैं। यह चारों ऐसे वर्ण है जिनका उच्चारण करते समय हमारे मुंह से निकलने वाली हवा के कारण गर्मी पैदा होती है। आप इनका उच्चारण करके देख सकते हैं की इन्हें बोलते समय मुंह से हवा छोड़नी पड़ती है।

4. संयुक्त व्यंजन – जैसा कि इसके नाम से ही पता चल रहा है संयुक्त का मतलब होता है जुड़कर या मिलकर, इसीलिए 2 व्यंजनों के मेल से  बना व्यंजन संयुक्त व्यंजन कहलाता है। संयुक्त व्यंजन में, व्यंजन वर्ण के दो व्यंजन मिलकर एक संयुक्त व्यंजन का निर्माण करते हैं।

संयुक्त व्यंजन की संख्या भी चार है। क्ष,त्र,ज्ञ,श्र संयुक्त व्यंजन कहलाते हैं जिसका कारण है की यह व्यंजन दो व्यंजनों के मेल से बनते हैं जिस मेल को कुछ इस प्रकार समझा जा सकता है।

  • क्ष = क् + ष
  • त्र = त् + र
  • ज्ञ = ज् + ञ  
  • श्र = श् + र

यहां देखा जा सकता है कि यह चारों व्यंजन दो व्यंजनों के मेल से बन रहे हैं, अत: ये संयुक्त व्यंजन कहलाते हैं।

प्राणवायु के आधार पर व्यंजन के कितने भेद होते हैं?

मुख्य विभाजन के अलावा प्राणवायु के आधार पर व्यंजनों के दो प्रकार होते हैं जिनमें महाप्राण तथा अल्पप्राण व्यंजन शामिल है।

महाप्राण व्यंजन

इनकी परिभाषा में, उन व्यंजनों को महाप्राण व्यंजन कहा जाता है जिन का उच्चारण करते समय प्राणवायु अधिक निकलता हो।  प्राणवायु व्यंजनों की संख्या 14 है जिसमें पांच वर्गों के सम वाले स्थान (यानी 2 4  इत्यादि स्थान) तथा ऊष्म व्यंजन शामिल है।

ख,घ,छ,झ,ठ,ढ,थ,ध,फ,भ,श,ष,स,ह। यह सभी महाप्राण व्यंजन है।

अल्पप्राण व्यंजन

उन व्यंजनों को अल्पप्राण व्यंजन कहा जाता है जिनका उच्चारण करते समय प्राणवायु महाप्राण की तुलना में कम प्रयोग होती हो।  इन व्यंजनों की संख्या 19 है जिनमें पांच वर्गों के विषम स्थान( यानी 1  3  5  स्थान) वाले 15  वर्ण तथा 4 अंत:स्थ व्यंजन शामिल है।

क,ग,ङ,च,ज,ञ,ट,ड,ण,त,द,न,प,ब,म,य,र,ल,व यह सारे अल्पप्राण व्यंजन है।

उक्षिप्त के आधार पर व्यंजन के कितने भेद होते हैं?

उक्षिप्त व्यंजन – इसके अंतर्गत सिर्फ दो ही व्यंजन होते हैं। इनके उच्चारण में जीभ एक से ज्यादा बार कहीं और फिर कहीं और टकराती है।

यह वर्णन संस्कृत में नहीं है यह हिंदी में नए आए हैं इसीलिए इन्हें नव विकसित कहा जाता है। इन व्यंजन से कभी कोई शब्द शुरू नहीं होता है, यह हमेशा शब्दों के बीच या अंत में प्रयोग होते हैं।

ड़ और ढ़ द्विगुण व्यंजन होते हैं।

उदाहरण में बढ़ना, कूड़ा, पड़ना इत्यादि।

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